"हिन्दी कविता का इतिहास काफी समृद्ध है। कविता में इतनी शक्ति और क्षमता है कि वह हरेक युग के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों को आत्मसात करती है। प्रयोगवाद और नयी कविता में नये भावबोध की अभिव्यक्ति हुई थी। प्रस्तुत समय की कविता के कथ्य एवं शिल्प में ये नयेपन परिलक्षित हैं। आगे के समय की हिन्दी कविता को नयी दिशा और दशा प्रदान करने में ये नयेपन और भावबोध की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। यह ऐसा समय है, जिसमें विश्वभर में होने वाले परिवर्तनों की, दुनियाभर की तमाम भाषा और साहित्य में प्रतिध्वनि हुई थी। हिन्दी भाषा और कविता समय सापेक्ष हैं। विद्रोह, संघर्ष और प्रतिरोध इसका अभिन्न अंग बन गया है। यह पुस्तक केरल विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर चयनित है। इसमें प्रयोगवाद से समकालीन तक के प्रतिनिधि कवियों की कविताएँ तथा वरिष्ठ कवि प्रोफ़ेसर अरुण कमल का प्रौढ़ आलेख भी समाहित है। आशा करती हूँ कि यह किताब स्नातकोत्तर छात्रों को प्रयोगवाद और समकालीन कविता की अवधारणा एवं स्वरूप से अवगत कराने में सहायक सिद्ध होगी। -प्रो. (डॉ.) एस. आर. जयश्री, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग केरल विश्वविद्यालय, तिरुवनन्तपुरम् "
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