"सियाहत - विभिन्न ऐंगल्स से अदेखा सौन्दर्य सामने रख देने की फ़ोटोग्राफ़िक स्किल्स और आत्मीय स्पेस में रचनात्मक आकुलता के जोड़ से जो शाब्दिक दृश्य बनते हैं, वही सियाहत है। यात्राओं की बाबत इंटरनेट से आक्रान्त हमारे सौन्दर्यबोध को अपने यात्रा-वृत्तान्त से आलोक रंजन ने कुरेदा भी है और विस्तार भी दिया है। ‘विविधता में एकता’ पर गर्व करते हम दरअसल उत्तर भारत-दक्षिण भारत बोलते हुए कितनी सांस्कृतिक निस्संगता बरतते हैं, उसे इंगित कर साझी विरासतों से परिचित कराती यह किताब निविड़तम स्थानों में ले जाती है। मुतुवान आदिवासियों की अज्ञात दुनिया की सैर रोमांच और जोखिम से भरी होने के साथ हमारे सँभालकर तहाये गये यात्रा-अनुभवों में सिलवटें भी ले आती है । चित्रात्मक सौन्दर्य से पूरम्पूर पुस्तक में सांस्कृतिक-ऐतिहासिक विमर्श के लिए लेखक ने निश्चित ही कई अन्तःसूत्र पाठकों को प्रदान किये हैं । - दिव्या विजय "
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