बढ़ाते चले गए - Couverture souple

अर्शदीप सिंह

 
9798900897974: बढ़ाते चले गए

Synopsis

यह संग्रह केवल कविताओं का नहीं, बल्कि एक सामूहिक संवाद का उत्सव है। हर रचना किसी प्रेरणा का विस्तार है — कहीं एक गहरी तड़प, कहीं अनकहा उल्लास, तो कहीं जीवन के क्षणिक अनुभवों पर शांत आत्ममंथन। इन पंक्तियों में कविताएं नहीं, बल्कि उन आत्माओं की बातचीत है जो शब्दों के माध्यम से जुड़ीं, एक-दूसरे में खुद को ढूंढती रहीं। यह पुस्तक एक यात्रा का निमंत्रण है — ठहरने, सोचने और अपनी ही धड़कनों की प्रतिध्वनि इन शब्दों में खोजने का। यह प्रमाण है कि जब हम अकेले नहीं, बल्कि सामूहिक प्रेरणा की गर्माहट में लिखते हैं, तो शब्द सीमाओं को पार कर जाते हैं और आत्माओं को जोड़ते हैं।

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